24-28 सितंबर 1990 में एक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस त्राबल्स, यानी लीबिया में मुनक़्द हुई। उस कॉन्फ्रेंस की दावत के मुताबिक मैं त्राबल्स में था। 25 सितंबर की शाम का वक़्त था, मैं अपने कमरे की बालकनी पर खड़ा हुआ, सामने हद्द-ए-नज़र तक फैले हुए बुखैरे रूम, यानी मेडिटेरेनियन सी, को देख रहा था। उस वक़्त समंदर में कुछ तफ़रीही कश्तियाँ नज़र आईं, जो अपने मुसाफ़िरों के साथ समंदर में तेज़ रफ़्तारी के साथ दौड़ रही थीं। फ़ज़ा में कुछ समंदरी चिड़ियाँ मंडला रही थीं, जो बार-बार मछली पकड़ने के लिए पानी में गिरती थीं। साहिल से मिली हुई सड़क पर दौड़ती हुई कारों का मंज़र था, जो अपने मुसाफ़िरों को लिए हुए मुसलसल चली जा रही थीं। इन चीज़ों को देखकर मेरी समझ में आया कि क़ुरान की इस आयत का मतलब क्या है। तर्जुमा: "हमने आदम की औलाद की तकरीम की, और हमने उनको सवार किया"—यानी हमलना। ख़ुश्की और तरी में। सूरह नंबर 17, आयत 70। और इस आयत में इंसान के लिए जिस तकरीम का ज़िक्र है, उससे क्या मुराद है? वह यह कि इंसान के साथ हमलना का मुआमला किया गया है, जबकि हैवानात के साथ हमलना का मुआमला नहीं किया गया। पाँव वाले जानवर अपने पैरों पर चलते हैं, मछलियाँ अपनी ताक़त से तैरती हैं, चिड़ियाँ अपने बाज़ुओं के ज़रिए उड़ती हैं, मगर इंसान सवारी पर बैठकर अपना रास्ता तय करता है। ख़ुश्की में उसके लिए गाड़ी है, समंदरों में उसके लिए कश्ती है, और फ़ज़ाओं में उसके लिए हवाई जहाज़ है। गोया इंसान के लिए अल्लाह ताला ने शाहाना मुआमला फरमाया है। जो लोग इस अतीये इलाही का हक़ीक़ी एहसास करके उस चीज़ का सबूत दे सकें, जिसको हमद और शुक्र कहा गया है, ऐसे लोगों के साथ आख़िरत में भी शाहाना मुआमला किया जाएगा। जैसा कि क़ुरान में इरशाद हुआ है: وَإِذَا رَأَيْتَ ثَمَّ رَأَيْتَ نَعِيمًا وَمُلْكًا كَبِيرًا सूरह नंबर 76, आयत 20। यानी: "और तुम जहाँ देखोगे, वहीं अज़ीम नेमत और अज़ीम बादशाही देखोगे।" तामीर-ए-शख्सियत: मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान, सफा नंबर 134।
اللہ کی معرفت دین کی روح ہے۔ معرفت کے بغیر دین ایک بے جان صورت بن جاتا ہے۔
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